“शिक्षा” Lesson Moral Hindi Story

आज हम शिक्षा Lesson Moral Hindi Story पोस्ट में बात करने वाले है एक हिंदी ऐतिहासिक कहानी के बारे में जो की “शिक्षा” से जुडी हुई है, और मुझे विश्वाश है की शायद आपको यह जरूर पसंद आएंगी। आपको जरूर पता ही होगा की शिक्षा का हमारे जीवन में क्या महत्व है और जीवन जीने में यह आपको किस तरह काम आ सकती है. अगर आपको अच्छी शिक्षा मिलती है तो आप जीवन में बहोत कुछ कर सकते है.

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शिक्षा Moral Hindi Story

जिन दिनों मृदुल अपने गाँव में रहता था, उसका पढाई सीमित थी। पुस्तकों के अतिरिक्त संस्कृत, प्राचीन ग्रन्थ और मराठी की धार्मिक पुस्तकों को बह पढ़ता था। साथ ही माँ और बाप के संग घर के काम काज में भी बह हिस्सा बटोरता और काफी समय अभ्यास में लगाता, इससे उसे अन्य साधारण शिक्षा का समय न मिलता । माँ का मन, अध्ययन की अपेक्षा, सेवा और भजन की ओर विशेष रूप से आकर्षित था।

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लेकिन फिर तो उसका मन धीरे धीरे सांसारिक विषयों से मन होने लगा। इससे उसे मुख्यतया धार्मिक और आध्यात्मिक पुस्तकों का पाठ ही अच्छा लगता । आधुनिक जीवन अन्यों में भी स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, रानडे और उनके जीवन तथा धर्म संबंधी व्याख्यान और माला को पढ़ने में उसका मन लगता था ।

यही नहीं, उन्होंने मुकुन्द के मन में भी ऐसे ग्रन्थ पढ़ने की रुचि जागृत की थी, इसके कारण, जब तक मुकुन्द बम्बई गया, तब तक उसे अधुनिक साहित्य का तनिक भी परिचक न मिला था, यह कहा जा सकता है। मुंबई जाने पर, पहले दो वर्ष उसने अभ्यास पक्का करने में लगगए।

जब कोई क्लास न लगती, तो मुकुन्द लाइब्रेरी में जाता और ऊँची कक्षाओं के लिए निर्धारित पुस्तक पढ़ता । सामान्य ललिव साहित्य की ओर उसका आकर्षण न खींच पता था । लेकिन धीरे धीरे उसका मन वेदान्त की ओर गतिशील होता गया। उसके प्रोफेसर राधानन्द के अन्य ज्योंही उसे प्राप्त होते, वह उन्हें पढ़ने में डूब जाता। परन्तु इन सबसे अधिक प्रभाव, उस पर टाल्स्टाय का पड़ा था।

लेकिन उसने टाल्स्टाय की अनमोल कृति ‘कला क्या है? पढ़ी। इस किताब पर बह इतना अधिक मुग्ध हो गया कि फिर तो उसने मानो टाल्स्टाय के ग्रस्थों का रटना ही शुरू कर दिया। उसका इस प्रकार का पागलपन देखकर उसके मित्रों और सहपाठियों को बहोत आश्चर्य हुश्रा।

साधारन तरीके से मृदुल का यह अनुभव था कि विद्यार्थियों को अपनी पाठ्य-पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें पढ़ने की कभी इच्छा नहीं होती। और शायद उन्हें ऐसी इच्छा होती है तो, सिर्फ गन्दी पुस्तकें पढ़ने जितनी ही होती थी. मृदुल से यह बात छिपा न रहा कि उसके साथियों में से कई रेनाल्ड्ज़ और गार्विस की उपन्यास कथाएँ हाथ में लेकर फिरते हैं और बोलने तथा लिखने में भी उन्हीं की भाषा की नकल करने की कोशिश करते थे।

लेकिन शास्त्रीय ग्रन्थ पढ़ने की ललक देखकर, चन्द्रशेखर एक नई पुस्तक लिये उसके पास आया। वह सभी पुस्तक यौन साहित्य से सम्बन्धित थी। मृदुल ने आज यह नया कुछ देखा, लेकिन उसे पढ़ने पर उसका मन नहीं लगा। तुझे ऐसी पुस्तकें पढ़ना पसन्द है ?

मृदुल ने चन्द्रशेखर को पुस्तक लौटाते हुए पूछा। क्यों, इसमें तुम्हें क्यों बुरा क्या लग रहा है ? चन्द्रशेखर ने मृदुल से पूछा। मुझ पर इस किताब की जरा मी ठीक छाप न पड़ी। आश्चर्य की बात है। चन्द्रशेखर ने कहा आभिकि दुनिया में कई विख्यात स्त्री पुरुष ऐसी पुस्तकों की योग्यता पर ज्यादा जोर देते हैं और उनकी तारीफ़ भी करते हैं। लेकिन इनसे कितना शान प्राप्त होता है यह क्या तुम्हें क्या पता होगा? अगर तुझे पहले ज्ञात न हो और तब इस पुस्तक को पढ़ने से तुम्हे इस बात का ज्ञात हो जायेगा, अरे जरा बता, ऐसा कौनसा ज्ञान तुझे मिला ? मृदुल ने सस्मित कटाक्ष में पूछा।

आज हम बात करने वाले है एक हिंदी ऐतिहासिक कहानी के बारे में जो की “शिक्षा” से जुडी हुई है और मुझे विश्वाश है की शायद आपको यह जरूर पसंद आएंगी। आपको शायद पता ही होगा की शिक्षा का हमारे जीवन में क्या महत्व है और जीवन जीने में यह आपको किस तरह काम में आ सकती है. अगर आपको अच्छी शिक्षा मिली है तो आप जीवन में बहोत ही प्रगति कर सकते है.

अब पहले तो चन्द्रशेखर इसका उत्तर दे न पाया। उचित जवाब न मिलने पर उसने कहा मेरी बात जाने दो। इस दुनिया में ऐसे कई हैं जो दुनिया की बात जो दूसरे लोग जानते हैं या नहीं, ये कब कौन देखने गया है। आज के जमाने में ऐसी किताबे अनजान लोगों के हाथ में नहीं है, लेकिन जान-कारों के हाथ मेंही होती है, खासकर अधिक प्रमाण में वही पढ़ते हैं।

कोई भी दिल की जो बात हम दूसरे को नहीं कह सकते, वह यदि इस प्रकार खुले रूप में मिल जाये तो किसे नहीं पसन्द आएगी। और मेरा खयाल है, इस तरीके से हम में जो विकार सोए हैं उन्हें जागृत और बलवान बनाने में ऐसी चीज़ जरूर काममे आती हैं. इसमें दूसरा कुछ नहीं है ,और जबसे मुकुन्द कालिज में भर्ती हुआ, वह बोर्डिंग में रहता था। जिस दिनों वह गोपाल के घर में रहता था उन दिनों उसे पर्याप्त रिजल्ट में एकान्त प्राप्त होता था।

परन्तु अब वह स्थिति न रही । घर में उसे जरा मी शान्ति और स्वस्थता नही मिली। वहाँ अलग अलग प्रकार के विद्यार्थी थे और उनकी भाषाएँ भी विचित्र थीं । सुबह में वे पुस्तके रटते। रात में ऊधम मचाते । यही उनका पुरे दिन का कार्यक्रम था। धींगा-मस्ती करते और तूफ़ान उठाते वे कभी थकते ही नहीं ।इससे अब मृदुल को अपने पढाई में एकान्त मिलना मुश्किल हो गया।

उसे बड़ी देर उठने की आदत थी। अब उसे सुबह के चार से सात बजे तक ही तनिक शान्ति का वातावरण मिलता, क्योंकि इस समय सभी विद्यार्थी सोए पड़े रहते थे। रात भर वे मस्ती करते और अब सुबह में उनसे जल्दी उठा न जाता। उस दिनों मुकुन्द स्कूल में था, उन दिनों उसे विद्यार्थी-जगत् का ऊपरी शान था । लेकिन नई जनरेशन किस प्रकार की है, इसका शान तो उसे बोडिंग में आने पर ही पता चला. अपनी क्लास में होशियार माने जाने वाले विद्यार्थियों का जीवन कितना गन्दा और आलस भरा था यह देख देखकर मुकुन्द को घृणा आती थी।

उनमेसे कई विद्यार्थी तो तीन तीन दिन तक नहाते मी नहीं थे। कई दाँतों को साफ़ भी नही करते थे। कइयों को नाक, कानों में उँगली डालने की बुरी आदत थी। कुछ खुजली से ज्यादा पीड़ित थे। वह आमिर घर के लड़कों को पैसे की कीमत मालूम नहीं थी और वे मनमाने इरादे से खर्च करते थे। रात को बारह से एक बजे तक वे होटलों में बैठे चाय पीते अथवा सिगरेट का धुआँ उड़ाते। इसमें उन्हें कोई विचित्रता नहीं लगती थी. बोलने चलने का उनमें कोई ढँक का नहीं था । किसी प्रकार विषय में वे नियमित न थे।

बोर्डिंग का व्यवस्थापक एक गुजराती आदमी थाऔर वह विद्यार्थियों में बड़ा अप्रिय था । इसका कारण यह था कि वह बहुत ज्यादा कठोर था । और कठोर होते हुए भी प्रभावशाली न बन पाया था। उसकी कंजूसी विद्यार्थियों की टीका का बड़ा विषय बन गयी थी। और कंजूसी भी कैसी बारह बारह महीनों तक वह एक ही कोट पहनता और आँखों पर हमेशा चश्मा चढ़ाए रखता था।

और यदि किसी एक विद्यार्थी को कड़ी दृष्टि से देखना होता तो वह अपने चश्मे ऊँचे चढ़ाता और चश्मे में अपनी आँखें टेढ़ी करके कुछ ऐसी रीति से देखता कि विद्यार्थियों को नया मिल जाता। व्यवस्थापक कद ठिंगना और शरीर मोटा था। इससे लड़के उसे ठिंगूजी कहकर पुकारते। और उसने तीन शादियां की थीं जिसमे पहली दो बिबिया मर गई थीं। और अब तीसरी बिहा कर लाया था।

यह स्त्री उम्र में बहुत छोटी थी और स्वभाव इसका बचिओ जैसा था। सांसारिक विषयों का उसे तनिक भी अनुभव न था, इस कारण पति की ओर से उसे बारम्बार फटकार मिलती। इतना ही नहीं वह यदा-कदा उसे पीटता । ऐसे वक्त यह नन्हीं बीबी शोर-गुल मचाती और चीखकर रोती । उसकी चीख-पुकार सुनकर सारे बोर्डिंग के विद्यार्थी वहाँ धड़ाधड़ करते दौड़ जावे और दूर से यह तमाशा देखते।

इस हृदय-द्रावक दृश्य को देखकर विद्यार्थी कोई सबक नहीं लेते। वे तो इसमें आनन्द ही पाते। यह देख-देखकर मुकुन्द को अपार दुःख होता । पुरुष ऐसा पशु स्योंकर बन जाता है ? और स्त्री भी यूँ तक किए बिना ऐसे अत्याचार कैसे सह लेती है। यह मुकुन्द के लिए आश्चर्य का विषय था। उसके सह- पाठियों में से कुछ ही ऐसे ये जो उसकी ओर सहानुभूति दर्शाते या उसके विचारों का अनुमोदन करते।

यदि ऐसा करते, तो भी केवल मुकुन्द को खुश रखने के लिए ही और केवल मौखिक रूप से ही। कई विद्यार्थी कहते-“यह तो दुनिया की परम्परा है, इसमें कौन-सी नई बात है ? विचार करने-जैसी कौन- सी चीज़ है अकेले लीलाधर को ही यह बात सुनकर, व्यवस्थापक पर गुस्सा आता और वह दाँत कटकटाकर कहता यदि मैं इस योडिंग में रहता होता, तो इन नर पिशाचों की जान ले लेता।

कॉलिज जाने पर ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, त्यों-त्यों मुकुन्द को कई बातों का अनुभव। उसका अनुभव अधिकाधिक बढ़ने लगा । उसने देखा कि नई पीढ़ी का मन, जितना चाहिए उतना शुद्ध नहीं है।

विद्यार्थियों पर प्रत्येक प्रकार से अपनी छाप डालने वाले, उनके पीछे-पीछे फिरने वाले, और निकृष्ट कुचेष्टा करने वाले कई विद्यार्थी उसकी नज़र में आए। और दुःख की बात तो यह थी कि कई बार वे विद्यार्थी ऐसी-ऐसी डींग मारते थे, जिनमें कालिज की कन्याओं द्वारा उन्हें प्रोत्साहन मिलने की चर्चा रहती।

मुकुन्द ने ये चर्चाएँ सुनी थीं। और दुख की बात तो यह थी कि कई बार वे विद्यार्थी वहा ऐसी ऐसी डींग मारते थे, जिनमें दूसरे कालिज की कन्याओं द्वारा उन्हें प्रोत्साहन मिलने की चर्चा रहती थी। मृदुल ने ये चर्चाएँ सुनी थीं की इसी समय मृदुल ने टाल्स्टाय की पुस्तक रिसरक्शन पड़ी, जिस पुस्तक ने उसके मन में, अनदेखे ही क्रान्ति के बीज बो दिए, उस समय मृदुल को इस बात का भान न था।

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